त्राटक विद्या

सदगुरुनाथ महाराज की जय

“ श्री गणेशाय नमः ”

ऐसी अनेक साधनायें हैं जो मन को एकाग्र करने के लिये हैं। त्राटक विद्या भी उनमें से एक है।

एक सीधी सी बात है कि हम दूसरों पर प्रभाव के लिये,

बातचीत के समय जितना नेत्रों का उपयोग करते हैं, उतना शरीर के किसी अन्य अंग का नहीं।

हमारे प्राचीन, आधुनिक कवियों ने प्रेम,क्रोध,वात्सल्य आदि में जितनी तारीफ आँखों की है, उतनी किसी की नहीं की।

मानव की जुबान के बाद आँखे ही हैं जो बोलती हैं। आँखों की अलग ही भाषा है

अपने मन चित्त को स्थिरता प्रदान करने के लिये त्राटक एक अचूक उपाय है।

त्राटक के लिये साधक को आत्मविश्वासी और आशावादी होना चाहिये।

नेत्रों में कोई रोग न हो औरसीखने की प्रबल इच्छाशक्ति हो। साधक को खान-पान पवित्र रखना चाहिये।

शरीर अगर निरोगी, बलवान होगा तो साधना का फल शीघ्र ही मिल जायेगा।

त्राटक में हमें एक निश्चित स्थान पर, कुछ समय तक बिना पलक झपकाये देखना होता है।

इसकी विधि कुछ कठिन नहीं है।

त्राटक हठयोग का ही एक अंग है।

जैसे-जैसे हम त्राटक का अभ्यास बढ़ाते हैं, हमारे नेत्रों में शक्ति का संचार होने लगता है।

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त्राटक विद्या

त्राटक करने का तरीका – कम से कम दो फ़ीट लंबा और दो फ़ीट चोडा लंबा सफेद कागज लें।

उसके मध्य में एक छोटा सा  लगभग एक इंच के करीब गोल निशान बनायें।

यह बिल्कुल डार्क काले रंग का हो।

उस काले निशान के मध्य में एक बिंदु के आकार के बराबर पीला रंग भर दें।

पीला बिंदु इतना हो कि आँखों से दीखता रहे।

अब इस कागज को कमरे की दीवार पर या किसी भी स्थान पर लगा कर उससे कुछ दूरी पर आराम से बैठ जायें।

बस ये ध्यान रहे कि वह काला गोला बैठने के बाद आपकी आँखों की सीध में हो।

कमरे में हल्का प्रकाश हो।

कमर सीधी रख कर इस काले गोले पर अपनी आँखें गड़ाएं एकटक देखते रहें।

सारा ध्यान उस काले गोले पर केंद्रित कर दें।

एसा भाव लायें जैसे कि आपकी आंखें उस निशान को बेध देंगी।

आँखों में  दर्द  होते ही अभ्यास को रोक दें।

यह क्रिया करने के लिये सुबह का समय ठीक है।अभ्यास को हर दिन थोड़ा-थोड़ा बढ़ाना चाहिये।

काले गोले को ध्यानूर्वक देखते रहने पर उसमें तरह.तरह के अनुभव सामने आते हैं।

एसा लगेगा कि वह कभी आकार में बड़ा हो जायेगा, कभी छोटा।

कभी रंग भी बदलेगा, कभी हल्का सा प्रकाश पुंज घूमता हुआ दिखाई देगा, कभी हल्का धुँधलापन आयेगा।

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मन के स्थिर होने पर यह प्रकाश पुंज भी स्थिर होने लगेगा। इस प्रयोग की अवधि को धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिये।

तीन मिनट से बीस-पच्चीस मिनट तक ही करें।

त्राटक करने की और भी कई विधियां बताई गई हैं। एकांत में दीपक की लौ पर किया जा सकता है।

सूर्य अथवा चन्द्रमा पर दृष्टि जमाने से भी त्राटक किया जा सकता है।

पहली विधि साधकों के लिये ज्यादा आसान है।

कुछ लोग अपनी नाक के अग्र भाग पर भी ध्यान लगाकर त्राटक करते हैं।

त्राटक विद्या

त्राटक करने के बाद अपने नेत्रों को शीतल जल से धो लें। अभ्यास के बाद कोई ठंडी चीज या ठंडा पेय पीना भी फायदेमंद है।

इससे शरीर की गर्मी शांत हो जाती है। त्राटक के नियमित अभ्यास से हमारे नेत्रों में एक नई जान, ऊर्जा, चमक का विस्तार होता है।

यह एक रहस्यमय प्रक्रिया है। जैसे हम तल्लीनता से किसी एक वस्तु पर ध्यान लगाकर देखते हैं, उसमे खो जाते हैं और कुछ समय के लिये बाहरी दुनिया से कट जाते हैं,

ठीक उसी प्रकार हम त्राटक विधि से ध्यान करें तो, कुछ समय के बाद हमारा मन भी एकाग्र होने लगेगा तथा हमारा ध्यान अच्छा लगेगा,

चित्त भी प्रसन्न एवं शांत हो कर स्थिर हो जायेगा।

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