मनुष्य जीवन की सच्चाई – ह्रदय में आत्मा का ज्ञान

 सदगुरूनाथ महाराज की जय

“ श्री गणेशाय नमः ”

मनुष्य कँहा जा रहा है? मनुष्य कँहा से आया है और क्या करने के लिये आया है?

लक्ष्य भूल गया है। अब राजमार्ग पर वापिस आने का समय आ गया है।

मनुष्य स्वयं ही परम् सत्य है किन्तु अपना उद्देश्य,

यह राजमार्ग और कोई नहीं मनुष्य के अंदर का आंतरिक मार्ग है।

जो मनुष्य को अपने असली स्वरूप की ओर ले जाता है,

उसकी खोज में जाता है। प्राचीनकाल से ही मनुष्य जिस परम् सत्य की खोज में लगा है,

जिसे वह ढूंढ रहा है वह सत्य पहले से ही उसके अंतर में आत्मा के रूप में,

परम् चिति के रूप में स्थित है।

जिस समय मनुष्य अपने अंदर के सौन्दर्य को,उस अपनी आत्मा के प्रकाश को पहचान लेता है,खोज लेता है,

तब हम अपने आस-पास की दुनिया में भी उसे पहचान लेते हैं।

हम उसे प्रकृति के हर रंग में,स्वरूप में अपने मित्रों,पारिवारिक सदस्यों,

अंजान लोगों में और सूक्ष्म सांसारिक गतिविधियों में भी देख पाते हैं|

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मनुष्य जब अपने अंतर के उस परमानंद को पहचान लेता है,उस सच्चे प्रेम के उदगम को  ढूंढ लेता है,

तब मनुष्य सही मायनों में सच्ची मानवता को भी ढूंढ लेता है।

इस समय संसार में काफी प्रगति हो रही है लेकिन किस दिशा में?

लोग सुधारों की बात करते हैं,मगर पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करते हैं।

अपना पारिवारिक जीवन गलत दिशा में ले जाकर खराब कर रहे हैं,

आपस का भाई-चारा नष्ट कर रहे हैं। हर ओर दंगा-मारपीट,झगड़ा,चोरी,अनैतिकता!

सभी देशों के बीच तनाव का माहौल है।

मनुष्य जीवन की सच्चाई - ह्रदय में आत्मा का ज्ञान

समाज जातियों में आपस में द्वेष में,राजनेता आपसी वैमनस्य में लगे हैं।

संसार हमें मानवता की सच्ची समझ दे ऐसी ही वस्तु की हमें जरूरत है।

संसार के लगभग सभी धर्म के अनुयायियों ने मुक्त कंठ से कहा है कि मनुष्य से ऊपर कुछ नहीं है।

धार्मिक पुराणों और प्रकृति के क्रम रूप विकास के अनुसार चौरासी लाख योनियों से गुजरने के बाद मानव देह प्राप्त होती है।

चौरासी लाख योनियों का भेदन होता है।


आरंभ में मनुष्य .. मनुष्य की योनि प्राप्त होने पर भी स्वभाव से पशु ही रहता है।

कारण वह अनेक प्रकार के वासना,प्रलोभन,मोह,अहंकार तथा इच्छाओं से ग्रस्त होता है।

आत्मशुद्धि का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है। पूर्व के कई जन्मों के संस्कार घूमते रहते हैं।

इन संस्कारों की जड़ में हमारी इन्द्रियों की अधूरी इच्छाएँ हैं।

अतः सबसे पहले मानव को इन इच्छाओं के संसार से चित्त को निर्मल व स्वच्छ करना बेहद जरूरी है।

इसके लिये योग,साधना आदि अनेक प्रकार के साधनों का सहारा लिया जा सकता है।

इसके लिये निस्वार्थ कर्म करना होगा।

स्वयं के लिये न करके जो कामना विश्व के लिये होगी वही निष्काम कर्म होगा।

यहीं से चित्त शुद्ध होता है।

मानव सदैव आपस में प्रेमभाव से रहने की जगह लड़ाई झगड़े और होड़ की भावना में डूबा रहता है।

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एक सच्ची समझ के अभाव में वह यह बर्ताव करता है।

अपने बारे में सच्ची समझ नहीं जान पाता। अपने ह्रदय में छिपी महानता के बारे में नहीं समझ पाता,

और इन्हीं तुच्छ विचारों में डूबा रहता कि वह मामूली है,कमजोर है,तुच्छ है।

किन्तु यदि मानव अपने अंदर की महानता,दिव्यता देख ले तो जान जायेगा कि पूरे संसार की महानता,

सुंदरता उसके अंतर में ही है।उससे भिन्न दिव्य बाहर कुछ  नहीं कंही नहीं।


आज अन्य पाश्चात्य देशों के वैज्ञानिक भी उस परम् सत्य को जान रहे हैं,

जो भारत के महान ऋषि-मुनियों को योगियों को हजारों वर्षों से मालूम है,

कि सिर्फ एक ही शक्ति है जो सारे संसार में फैली हुई है।

हमारे इन पुरातन योगियों ने इस शक्ति का नाम ईश्वर या चित्ति दिया है।

हम सब इस चित्तशक्ति का ही रूप हैं तथा एक दूसरे से अलग नहीं हैं,

और ईश्वर से भी भिन्न नहीं हैं।


हम आम का बगीचा लगाते हैं तो हमें आम ही प्राप्त होता है सेब या अनानास नहीं। इसी प्रकार जो ईश्वर से उत्पन्न हुआ वह ईश्वरीय अंश है,

उससे अलग कुछ नहीं। पर हमें इसका बोध नहीं रह पाता और हम अपने बारे में अपनी समझ को बदल लेते हैं।

जाने-अनजाने अज्ञानतावश हम अपनी समझ खो बैठे हैं।

हम अपने को अलग-अलग भागों में रूपों में बाँट बैठे हैं। गोरा-काला,स्त्री-पुरूष,डॉक्टर,इंजीनियर,व्यापारी आदि मानते हैं।

हमें यही बोध रहता है कि हम इस धर्म के हैं,उस धर्म के हैं,अमीर हैं,गरीब हैं,अमेरिकन हैं या अरब के हैं। किन्तु हम भूल गये कि हमारे अंतर में एक ही सत्य है।

हम सब के उत्पन्न होने का मूल एक ही बीज है-और वह बीज परमात्मा है। हमारी सांसारिक भूमिकाएँ अलग-अलग हैं।

इन भूमिकाओं को भूलकर यदि हम अपने अंदर की महानता तक चले जाएं,

तो समझ आ जायेगा कि हम स्वयं परमात्मा हैं।

मनुष्य जीवन की सच्चाई - ह्रदय में आत्मा का ज्ञान

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