मन- मानव का छिपा शत्रु भी और सबसे महान मित्र भी

प्राय: हमारे अंदर जो भी विचार उमड़ते  हैं उन्हें हम अपना संसार समझ बैठते हैं, हम जैसा सोचते हैं, कुछ समय के लिए हम वैसे ही हो जाते हैं| यह एक पुरातन रहस्य है|  इसी मन को हम यदि ईश्वर में मोड़ दें, तो यह भाग्योदय का कारण बन जाता है|

हम अनंत सुखों को पा सकते हैं| प्रत्येक जीव के अंदर आत्मा का निवास होता है|

जिसे जीवात्मा कहा जाता है|

मन हमारा सबसे परम मित्र भी है, और सबसे बड़ा शत्रु भी है|

हमारे अंदर जो आत्मा है उसे हम कई प्रकार के अभ्यासों व  प्रणालियों से  जानने का प्रयत्न करते हैं|

मगर आत्मा के निकट जाने में, उसे जानने – पहचानने में जो सबसे बड़ी रुकावट है वह है हमारा मन |

मन हमारे सच्चे स्वरूप को हमारी  अंतरात्मा को हमसे छुपा देता है|

वह उस पर एक प्रकार का आवरण डालकर ढक देता है|

मन हमें एक अलग ही दुनिया दिखाता रहता है|

वह हमें बार-बार यही समझाने का प्रयास करता है कि ईश्वर प्राप्ति बहुत दूर है,

और जो आनंद हम ढूंढ रहे हैं वह बाहरी जगत में ही मिलेगा |

परंतु यहीं खेल शुरू होता है, यही मन जो हमें आत्मा  से दूर ले जाता है,

वही हमें उससे मिलवाता भी है|

मन ही देवता, मन ही ईश्वर, मन से बड़ा न कोय |

हमारे प्राचीन ऋषि – मुनि जो निरंतर इसी शोध में लगे रहते थे और एक वास्तविक मनोविज्ञान से परिपूर्ण थे,

इस नतीजे पर पहुँचे कि मन ही मनुष्य की दुर्दशा का कारण है और यही उसके उत्थान और मुक्ति का भी साधन है|

मन ही सुख और दु:ख का कारण है|

मन से पवित्र और महान कोई मित्र नहीं है और इससे बड़ा कोई शत्रु भी नहीं है|

इस मायावी संसार में बहुत कुछ  सीखने योग्य है, ग्रंथ के ग्रंथ भरे पड़े हैं|

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किंतु यदि सही मायने में कुछ में सीखने या जानने योग्य है तो वह मन है|

मन को हमारे शरीर की आत्मा कहा गया है| आत्मा को जानने के लिए मन को मित्र बना कर रखना आवश्यक है,

(ह्रदय में आत्मा का ज्ञान जान ने के लिये यहाँ क्लिक करें) मन आत्मा के द्वारा अपना कार्य करता है|

हमेशा बाहरी वस्तुओं पर ही अपना ध्यान केंद्रित कर देता है| इसलिए वह स्थिर ना होकर सदा भटकता रहता है|

मन को आभास ही नहीं होता कि वह आत्मा के इतने निकट है|

वह आत्मा से अपनी निकटता भूलकर अपना प्रभाव व तेज खो बैठता है|

मन आत्मा के अत्यंत निकट होते हुए भी हमेशा बाहर की दुनिया की ओर ही भागता है|

आत्मा के प्रकाश को  प्रकाशित करने की अपनी सामर्थ्य को वह नष्ट कर देता है|

इसके बाद भी हम जब ध्यान करना प्रारंभ करते हैं तो मन धीरे-धीरे अंतर में स्थापित होना आरंभ हो जाता है और धीरे – धीरे शांत होता जाता है|

एक समय दीर्घ अभ्यास के पश्चात जब मन पूर्ण स्थिरता को प्राप्त होना आरंभ हो जाता है, तब हम आत्मा के सच्चे स्वरूप को जानने योग्य बन जाते हैं,

हमें आत्मा के प्रकाश का  अनुभव होना शुरू हो जाता है| मन को शांत करने के लिए उसे विचारहीन बनाने के लिए,

और उसे इस लायक बनाने के लिए कि वह अपने लक्ष्य को पहचान ले अपने मूल स्रोत को देख ले इसी हेतू योग और ध्यान का उदय हुआ है| 

मन- मानव का छिपा शत्रु  भी और सबसे महान मित्र भी

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