गुरु कृपा- महान गुरु साधना के समय अपनी शक्ति का शिष्य में योग करते हैं, जो शक्तिपात दीक्षा कहलाती है|

शक्तिपात दीक्षा

सदगुरू नाथ महाराज की जय

 श्री गणेशाय नमः 

शक्तिपात दीक्षा : शक्तिपात महान ऋषियों द्वारा दी जाने वाली एक रहस्यमयी गुप्त दीक्षा है।

आदिकाल से ही जीवंत परम्परा है,जो गुरु से शिष्य को दी जाती है।

आध्यात्मिक क्षेत्र में गुरु का स्थान सबसे ऊँचा होता है।

सदगुरू शिष्य का आधार,योग्यता समझ कर दीक्षा देते हैं।

सूर्य की किरणें सभी पर बराबर पड़ती है किन्तु अगर पानी स्वच्छ नहीं तो प्रकाश साफ नहीं दिखेगा।

आधार अगर दुर्बल है तो दीक्षा नहीं हो पाती।

शक्तिपात दीक्षा में सदगुरु अपनी शक्ति से साधक की कुंडलिनी को जाग्रत करते हैं।कुंडलिनी ब्रह्माण्ड की वह शक्ति है,

जो प्रत्येक मनुष्य के अंदर होती है। किन्तु अज्ञानता के कारण यह सुप्त अवस्था में रहती है।

श्री गुरु द्वारा शक्तिपात करने का मूल उद्देश्य ही शिष्य का कुंडलिनी जागरण  है।

सभी प्रकार की दीक्षा में ‘ शक्तिपात ‘ दीक्षा सबसे अच्छी मानी गयी है।

सदगुरु दीक्षा के दौरान कुंडलिनी को जगा देते हैं। श्री गुरु के पास शक्ति का अथाह भंडार होता है,

जिसे वह अपने योग्य शिष्यों को शक्तिपात के रूप में देते हैं।

शक्तिपात दीक्षा

यह एक रहस्यमयी क्रिया है, जो प्राचीन समय से ही चली आ रही है।

गुरु कृपा से ही ज्ञान प्राप्त होता है। सभी प्रकार की कृपा में गुरु कृपा सर्वश्रेष्ठ बतायी गयी है।

श्री गुरु अपनी इच्छा से चार तरीकों से शक्तिपात करके शिष्य की शक्ति ( कुंडलिनी ) को जाग्रत करते हैं –


1. स्पर्श द्वारा
2. शब्द (मंत्र) द्वारा
3. दृष्टि द्वारा
4. व संकल्प के द्वारा


स्पर्श से – इसमें श्री गुरु तीन स्थानों पर स्पर्श करते हैं। पहला स्थान दोनों भौं के मध्य अर्थात आज्ञा चक्र है।

दूसरा स्थान ह्रदय है। तीसरा स्थान रीढ़ की हड्डी , मेरुदण्ड के नीचे मूलधार चक्र है।

जिन सदगुरु की कुंडलिनी शक्ति गुरु कृपा व कठोर साधना से पूर्ण विकसित हो चुकी है, उनमें यह विद्यमान रहती है और उनका स्पर्श करते ही शिष्य में प्रवेश कर जाती है।

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शब्द (मंत्र) द्वारा – यह दीक्षा की दूसरी विधि है, शब्द या मंत्र द्वारा। गुरु अपनी शक्ति को एक मंत्र या शब्द से शिष्य में प्रवाहित करते हैं।

सदगुरु जिस मंत्र की दीक्षा देते हैं,उसे उन्होंने दीर्घकाल तक जपा होता है,

और वे मंत्र की शक्ति को पूर्ण विकसित कर चुके होते हैं। उसे उन्होंने अपने अंदर स्थापित कर लिया है।

ऐसे मंत्र में और गुरु में कोई अंतर नहीं रहता। गुरु का सम्पूर्ण शरीर मंत्रमय बन जाता है, तब वह मंत्र चैतन्य मंत्र हो जाता है।

यह मंत्र सभी प्रकार की शक्तियाँ भी प्रदान करता है। यदि शिष्य योग्य है तो गुरु का उसके कान में मंत्र फूँकना ही बहुत है,

कुंडलिनी शक्ति शीघ्र ही क्रियाशील हो जाती है।

दीक्षा की तीसरी विधि है- दृष्टि द्वारा दीक्षा। जो गुरु इस प्रकार की दीक्षा देते हैं,उनकी दृष्टि अंतर्मुखी होती है।

गुरु बाहर की ओर देखते हुए भी अपनी दृष्टि को आत्मा पर ही केंद्रित रखते हैं।

इस प्रकार उनकी दृष्टि आसानी से चिति की उस शक्ति को शिष्य में प्रवाहित कर सकती है।

अतः ये दीक्षा वही गुरु दे सकते हैं,जो स्वयं अन्तर सत्ता में प्रतिष्ठित हो चुके हैं।

शक्तिपात दीक्षा

दीक्षा की चौथी विधि – संकल्प द्वारा अथवा मानस दीक्षा

इसमें श्री गुरु के दीक्षा के बारे में विचार करने मात्र से शिष्य को दीक्षा प्राप्त हो जाती है।

गुरु संकल्प के द्वारा शिष्य में अपनी शक्ति को प्रवाहित करते हैं। एक शिष्य जो दीक्षा के लिये तैयार है,

गुरु के सानिध्य में आने मात्र से ही शक्ति को प्राप्त कर लेता है।

शक्तिपात का प्रभाव हर किसी पर एक जैसा नहीं होता। यद्यपि शक्ति सभी को एक जैसी ही दी जाती है,

किन्तु सभी की योग्यता एक जैसी नहीं होती। इसलिये शक्ति के जाग्रत होने पर अलग-अलग व्यक्तियों पर इसका अलग-अलग  प्रभाव पड़ता है।

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शक्तिपात को तीन भागों में बाँटा जा सकता है – मृदु , मध्य्म , और तीव्र। प्रत्येक श्रेणी की नौ उप-श्रेणियाँ होती हैं।

इस प्रकार एक व्यक्ति सत्ताईस तरीकों से शक्तिपात ग्रहण कर सकता है। पर शक्ति का स्वरूप एक ही रहता है।

व्यक्तियों की  अपनी-अपनी योग्यता ,सहने की क्षमता व परस्पर स्वभाव अलग-अलग होते हैं।

हर व्यक्ति अपने पूर्व जन्मों के संचित कर्मों,पाप-पुण्यों के आधार पर ही शक्तिपात दीक्षा प्राप्त करता है।

कुंडलिनी का हरेक के अंदर वास है। किसी व्यक्ति को किस तेजी से शक्तिपात मिलता है,यह उसकी श्रद्धा, उसकी साधना व शक्ति पाने की इच्छा पर निर्भर करता है।

एक व्यक्ति उतनी ही तीव्र मात्रा में शक्ति ग्रहण कर सकता है,जितनी उसमें शक्ति सँभालने की योग्यता होती है।

अपने पूर्व कर्मों और संस्कारों के कारण ही व्यक्ति को शक्ति का अनुभव तीव्र,थोड़ा कम तीव्रता से या बहुत कम तीव्रता से प्राप्त होता है।

श्री गुरु सभी को शक्ति प्रदान करते हैं। बस किसी को ये थोड़ा जल्दी मिल जाती है,और कुछ को थोड़ा समय बाद।

एक बार गुरु कृपा होने पर वह कभी खाली नहीं जाती और उचित समय आने पर अपना कार्य आरंभ कर देती है।


शक्तिपात होने के बाद व्यक्ति को इसे संभाल कर रखने की योग्यता होनी चाहिये|

साधक के लिये मंत्र,जप,ध्यान,संकीर्तन,अपने सदगुरु के प्रति निष्ठा,प्रेम आदर, और पवित्र व संयमित जीवन शैली ये सब शक्ति में वृद्धि के कारण हैं।

एक बार गुरु कृपा से शक्ति मिल जाये तो वह आज नहीं तो कल अपना कार्य प्रारंभ कर देती है। शक्ति स्वयं ही साधक को सही मार्ग पर ले जाती है।

शिष्य में जाग्रत हुई शक्ति पर गुरु का पूर्ण नियंत्रण रहता है। इस शक्ति का नाम ही महापवित्र कुंडलिनी शक्ति है,जो साधक को श्री गुरु के द्वारा शक्तिपात दीक्षा के रूप में प्राप्त होती है।

शक्तिपात दीक्षा

This Post Has 4 Comments

  1. राजू सिंह पटेल

    कृपया ये भी बताएँ की कौन से चक्र पर कौन सी महाशक्ति का वास है जैसे मूलाधार चक्र के स्वामी श्री गणेश, इसी प्रकार लिंग चक्र पर ब्रह्मा, नाभि चक्र पर श्री विष्णु अनाहत चक्र पर शिव कंठ चक्र पर आदि शक्ति दुर्गा, इसके ऊपर के चक्रों की जानकारी दें।

    1. Mayank Pathak

      सुझाव देने के लिए धन्यवाद | आगे की पोस्ट में इस अमुल्य विषय पर शीघ्र ही लेख आयेगा |

  2. विपिन कौशिक

    वर्तमान समय मे Delhi/Ncr मे सिद्ध मार्ग के संत कौन है ।

    1. Mayank Pathak

      फ़िलहाल तो यह बताना मुश्किल है, आपको जिसमें श्रद्धा हो वहां देख लीजिये- अगर कुछ दिनों में कुछ परिवर्तन नज़र आये तो अच्छा है|

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