समाधि कि सहज अवस्था

सदगुरुनाथ महाराज की जय

“ श्री गणेशाय नमः 

योग में अनेक प्रकार की अवस्थायें बताई गयी हैं। सभी साधनायें सहज होनी चाहिये। हठपूर्वक-बलपूर्वक ध्यान करना, साधना करना, समाधि में जाना न तो नेचुरल है और न ही ठीक है।

हम बलपूर्वक यानी जबरदस्ती किसी भी प्रकार की साधना को बढ़ाते हैं, तो यह कोई खास बात नहीं होती।

असल में वह एक वास्तविक समाधि के नाम पर धोखा है।

कई प्रकार के साधक इसी धोखे के साथ अपना यौगिक अभ्यास जारी रखते हैं।

इस प्रकार की समाधि के लिये विशेष-विधि के अभ्यास की आवश्यकता होती है।

जबकि इसके विपरीत वास्तविक समाधि को किसी विधि आदि पर आश्रित नहीं रहना होता।

समाधि

मनुष्य सहजरूप से ही अपने दैनिक अभ्यासों, प्रोग्रामों को आनंद से प्रेम से पूरा करता है।

उसका खाना-पीना, उठना-बैठना, सोना-जागना बिना किसी मेहनत के सहज ही होता है।

ठीक उसी प्रकार से सहजरूप से अपने ईश्वर के प्रति चिंतन करना, उसका ध्यान करना ही सहज समाधि की अवस्था है।

मानव अपने विषय में एक अलग ही धारणा रखता है।

बिज़नेस मेन हो, वैज्ञानिक हो, इंजीनियर हो, टीचर हो यह सब अपने को यही सब समझते हैं।

यही इनके अंदर सहज समझ है, जो हमेशा उन्हें ध्यान रहती है।

खाते-पीते, घूमते, सोते-जागते, हर टाइम कोइ भी काम करते हुए, उन्हें इसी समझ का ज्ञान रहता है।

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ठीक उसी प्रकार जब एक बार हमें गुरुकृपा द्वारा अपने सच्चे स्वरूप का बोध हो जाता है,

तब वह समझ हमारे अंदर तक विकसित हो जाती है, और बाहरी नकली समझ दूर हो जाती है।

जो समाधि ज्ञान, ध्यान, और गुरुकृपा से जन्मती है वह अलौकिक है, वही सहज योग है।

इस प्रकार इसका प्रतिदिन विकास होता रहता है।

दूसरी ओर पसीना बहाने से, बहुत ही मेहनत से,

थकाने वाली क्रियाओं से जो समाधि प्राप्त होती है वह इतनी सुलभ नहीं हो पाती।

ईश्वर को पाने के लिये आसान मार्ग ही अपनाना चाहिये।

अपने को भूल के उसमें समा जाना ही अच्छा तरीका है।

समाधि कि सहज अवस्था

हमें पहले यह जानना होगा कि सहज समाधि की अवस्था को कैसे प्राप्त करें।

श्री गुरु जैसी दिव्यात्माओं के पास ही वह तरीका है और जो भी उनकी शरण में आता है, उसको प्रदान कर सकते हैं।

बिना किसी परिश्रम के कठिन अभ्यासों के बिना ही श्री गुरु की कृपा से सहज अवस्था प्राप्त की जा सकती है।

महान संतों, सिद्ध पुरुषों की कृपा से हम ईश्वर के दर्शन कर सकते हैं।

मनुष्य सदैव अपने झूठे अहम में डूबा रहता है, इसलिये उसे यह समझना मुश्किल हो जाता है कि वह कौन है, उसका सच्चा स्वरूप क्या है।

परिणामस्वरूप वह कुछ पाने के चक्कर में सदा कुछ खोजने में ही भटकता रहता है।

अपने लक्ष्य से दूर होता चला जाता है, और उसकी सारी मेहनत बेकार चली जाती है।

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जब मनुष्य सारे प्रयत्न करने के बाद थक कर हार जाता है तब धीरे-धीरे उसका अहम भी नष्ट हो जाता है, उसी क्षण से ईश्वर को पाने का टाइम आरंभ हो जाता है।

उसका अपना प्रयास, अपना घमंड सब छूट जाता है और तब वह ईश्वर के पास आना आरंभ हो जाता है।

जब हम हम न रहकर उसमें खो जाते हैं, मैं को वो समझना आरंभ कर देते हैं तब हम ईश्वर प्राप्ति की ओर सही कदम बढ़ाते हैं।

जिस टाइम अपने को भूल कर सिर्फ उसका ध्यान करते हैं जँहा एक मौन के सिवा कुछ नहीं होता वंही से हमारा भाग्य चमकना शुरू हो जाता है।

गुरुकृपा का सच्चा आनंद मिलना शरू हो जाता है।

मैं भूल कर उस वो में डूबना ही सहज सच्ची समाधि की अवस्था है। वही वास्तविक स्वरूप है।

समाधि

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