श्री कृष्ण को गीता का ज्ञान, अर्जुन को देने की जरुरत क्यों पड़ी?

कृष्ण को गीता का ज्ञान, अर्जुन को देने की जरुरत क्यों पड़ी?

गीता संस्कृत महाकाव्य महाभारत में युद्ध के बीच की घटना है- जो भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद के रूप में है।

अर्जुन के युद्ध में आने के बाद उसका मन बदल जाता है, और वह युद्ध को लेकर दुविधा में आ जाता है, तब वह युद्ध न करने का निर्णय करता है।

इस पर भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को गीता का उपदेश, ज्ञान देते हैं। जो भगवद्गीता के नाम से प्रसिद्ध है।

लगभग 5000 वर्ष पहले श्री कृष्ण ने अपने मित्र अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था, जो आज भी सारे विश्व में मानव कल्याण के लिये एक अमर रचना है।

श्री मद्भागवत गीता सभी के लिये परम् पूजनीय और कल्याणकारी है।

भगवान श्री कृष्ण की अमृतमय वाणी है।

श्री मद्भागवत गीता पढ़ने से पहले हमें यह समझना जरूरी है कि आखिर भगवान श्री कृष्ण को गीता के ज्ञान, उपदेश देने  की आवश्यकता क्यों पड़ी।

श्री कृष्ण ने कब,क्यों,और कँहा गीता का उपदेश दिया।

 गीता महाभारत नाम के महाकाव्य का एक पार्ट है। जिसका श्री गणेश भगवान श्री कृष्ण के मुख  से हुआ।

संजय ने वेदव्यास जी द्वारा प्रदान की गयी दिब्य दृष्टि से धृतराष्ट्र को युद्धभूमि का वर्णन सुनाया।

श्री कृष्ण और अर्जुन के बीच क्या-क्या संवाद हुआ वैसा ही संजय ने बता दिया..यही संवाद श्री मद्भागवत गीता के नाम से जाना जाता है।

उनका यह संवाद उस महायुद्ध के आरम्भ होने से पहले का है, जो कौरवों और पांडवो के बीच होने वाला था।

धृतराष्ट्र और पांडु आपस में भाई थे।

धृतराष्ट्र जन्म से ही अंधे थे। इसी खामी के चलते उनके छोटे भाई पांडु को राजसिंहासन पर बैठाया गया।

इस बात को लेकर धृतराष्ट्र के मन में सदैव एक पीड़ा रही।

इधर एक श्राप के कारण पांडु की जवानी में ही मृत्यु हो गयी।

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पांडु के पाँच पुत्र थे- युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव।

और धृतराष्ट्र के दुर्योधन सहित सौ पुत्र।

धृतराष्ट्र को कुछ समय के लिये राज्य का उत्तराधिकारी अर्थात राजा घोषित कर दिया गया।

धृतराष्ट्र के पुत्रों और पांडु के पुत्रों का राजमहलों में एक साथ ही लालन-पोषण हुआ।

और दोनों के पुत्रों की शिक्षा-दीक्षा गुरुद्रोणाचार्य द्वारा संपन्न हुई।

सैन्यकला,युद्धनीति, अस्त्र-शस्त्र चलाने आदि का प्रशिक्षण गुरु द्रोण द्वारा समान रूप से सभी को दिया गया।

समय के साथ-साथ सभी बालक बड़े होने लगे। धृतराष्ट्र का बड़ा पुत्र दुर्योधन बचपन से ही हठी और अहंकारी था।

वह सदा पांडु पुत्रों से ईर्ष्या करता था।

धृतराष्ट्र मन ही मन अपने पुत्र दुर्योधन को राजा बनाना चाहता था, जबकि नियमानुसार उस पर युधिष्ठिर का अधिकार था।

दुर्योधन द्वारा समय-समय पर पांडवों के अंत की योजना बनती रही।

मगर विदुर की सूझबूझ और कृष्ण की कृपा से हर बार पांडवों के प्राणों की रक्षा होती रही।

कृष्ण मानव रूप में जरूर थे, मगर भगवान के अवतार थे।

वे पांडवों की माता कुंती के भतीजे भी लगते थे।

अतः धर्म का अवतार लेने के कारण और पांडवों से रिश्ता होने की वजह से वे सैदव पांडवों की रक्षा करते थे।

कृष्ण को गीता का ज्ञान

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अपने कुटिल मामा शकुनि के कहने पर दुर्योधन ने पांडवों को जुआं खेलने के लिये आमंत्रित किया।

अपने कपटी मामा शकुनि की सहायता से दुर्योधन ने पांडवों से उनका सारा राजपाट जीत लिया।

द्रौपदी को भी दांव पर लगा कर पांड़वों ने शर्मिंदा कर दिया, और उसे भी हार गये।

द्रौपदी कृष्ण भक्त थी। कृष्ण की कृपा से उसका वस्त्र चीरहरण नहीं हो पाया।

अपनी सारी संपत्ति, राज्य हारने के बाद पांडवों को तेरह वर्ष के वनवास के लिये जाना पड़ा।

वनवास का सारा समय बिताने के बाद, जब पांडव दुर्योधन से अपना राज्य वापिस माँगने गये तो उसने राज्य देने से साफ मना कर दिया।

श्री कृष्ण के द्वारा केवल पाँच गाँव ही देने की माँग भी ठुकरा दी।

अतः इन परिस्थितियों में पांडवों का दुर्योधन से युद्ध करना जरूरी हो गया।

सारा संसार इस युद्ध के लिये दो भागों में बँट गया।

कोई भी राजा निष्पक्ष नहीं रह पाया। जो जिसके पक्ष में था वो उसके खेमे में आ गया।

दुर्योधन द्वारा श्री कृष्ण के शांति प्रस्तावों को न मान कर युद्ध निश्चित हो चुका था।

पांडवों को श्री कृष्ण में पूरा विश्वास था और वह उनकी शक्तियों को पहचान चुके थे।

इसलिये युद्ध में उन्होंने श्री कृष्ण का साथ माँगा। दुर्योधन लोभी, अज्ञानी था वह श्री कृष्ण की सेना पा कर ही खुश हो गया।

अर्जुन के अनुरोध पर श्री कृष्ण ने युद्ध में उसका सारथी बनना स्वीकार कर लिया।

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अब यंही से भगवदगीता के आरंभ होने का समय आ जाता है। जँहा से भारत को ही नहीं पूरे विश्व को गीता जैसी अमूल्य धरोहर मिली।

युद्ध को बिगुल बज चुका है और दोनों ओर की सेनाये युद्ध के लिये तैयार हैं, तभी श्री कृष्ण अर्जुन को युद्ध से विचलित होते देखते हैं।

अर्जुन अपना धनुष रख देता है। तब श्री कृष्ण अर्जुन को समझाते हुए गीता का अमर ज्ञान देते हैं।

भगवान श्री कृष्ण का विराट रूप, ब्रह्मज्ञान, परमतत्त्व की प्राप्ति आदि विषयों पर संवाद है।गीता में कुल मिलाकर अठ्ठारह अद्ययाय हैं।

जिसमे भगवान श्री कृष्ण द्वारा बताया गया कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि बहुत से विषय प्रमुख हैं।

आत्मज्ञान प्राप्ति, आत्मा- जीवात्मा, परमात्मा के भेद व रहस्य का सम्पूर्ण परिचय बताया है।

जीव आते-जाते रहते हैं, जन्म-मरण चलता रहता है किन्तु आत्मा अजर-अमर है, यही गीता का मूल सिद्धांत है।

आम आदमी को गीता का ज्ञान, रहस्य समझाने के लिये अनेक प्रकार से सिद्धों, महात्माओं ने सरल ढँग से भी गीता की व्याख्या की है।

अब हमारा कर्तव्य है कि इस अमूल्य ज्ञान को समझें और अपने जीवन के व्यवहार में लायें।

कृष्ण गीता का ज्ञान

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